lic agent exam question papers with answers pdf

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lic agent exam syllabus Notes IRDA IC 38 Exam

 

1. बीमा का इतिहास

1. बीमा का इतिहासः ईसा पूर्व 3000 वर्ष से ही बीमा का किसी न किसी रूप में मान रहा है।

3. वर्ष 1706 में लंदन में शुरू की गई एमिकेबल सोसाइटी फॉर परपीचुअल एश्योरेन्स ही विश्व की सर्वप्रथम जीवन बीमा कंपनी मानी जाती है।

2. वर्तमान में प्रचलित आधुनिक वाणिज्यिक बीमा कारोबार की शुरुआत के संकेत, लंदन के लॉयड कॉफी हाउस में ढूंढे जा सकते हैं।

4. भारतः आधुनिक बीमा की शुरुआत लगभग 18 वीं सदी के आरंभिक वर्षों में हुई। इस दौरान विदेशी बीमाकर्ताओं की एजेंसियों ने मरीन बीमा समुद्री बीमा कारोबार की शुरुआत की।

5. द ओरिएंटल लाइफ इन्स्योरेन्स कंपनी लि. भारत में स्थापित की जाने वाली पहली इंग्लिश ज्ञविन बीमा कंपनी, की थी।

6. ट्रिटन बीमा कंपती लि: भारत में स्थापित पहली गैर-जीवन बीमा कंपनी।

7. बॉम्बे म्यूचुअल अश्योरेन्स सोसाइटी लि.: पहली भारतीय बीमा कंपनी। इसका गठन वर्ष 1870 में मुंबई में हुआ था।

8. नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लि. भारत की सर्वाधिक पुरानी बीमा कंपनी। इसकी स्थापना वर्ष 1906 में की गई थी और इसका कारोबार आज भी निरंतर चल रहा है।

9. महत्वपूर्ण वर्ष 1912 में बीमा कारोबार को नियंत्रण करने हेतु जीवन बीमा कंपनी अधिनियम एवं भविष्य निधि अधिनियम पारित किए गए। जीवन बीमा कंपनी अधिनियम, 1912 के तहत यह अनिवार्य किया गया कि प्रीमियम-दर की सारणी तथा कंपनियों के सामयिक मूल्यांकन का प्रमाणीकरण बीमांकक (एक्चुअरी) द्वारा किया जाए।

10. बीमा अधिनियम 1938, पहला ऐसा कानून था जिसे भारत में बीमा कंपनियों के संचालन को नियंत्रण करने हेतु बनाया गया था।

11. जीवन बीमा का राष्ट्रीयकरणः 1 सितंबर, 1956 को जीवन बीमा कारोबार का राष्ट्रीयकरण किया गया तथा भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) की स्थापना की गई।

12. उस समय भारत में 170 कंपनियां एवं 75 भविष्य निधि समितियां जीवन बीमा कारोबार में शामिल थीं।

13. वर्ष 1956 से वर्ष 1999 तक भारत में जंजीवन बीमा कारोबार का एकमात्र अधिकार एलआईसी को ही प्राप्त था।

14. गैर-जीवन बीमा का राष्ट्रीयकरणः वर्ष 1972 में साधारण बीमा कारोबार (जनरल इंश्योरेंस बिजुचेज़ नेशन्लाइजेशन एक्ट (जीआईबीएनए)) राष्ट्रीयकरण अधिनियम के लागू करने के साथ ही गैर- जीवन बीमा कारोबार की भी राष्ट्रीयकृत किया गया एवं भारतीय साधारण बीमा निगम (जीआईसी) तथा इसकी चार सहायक कंपनियों की स्थापना की गई।

15. जीआईसी की चार सहायक कंपनियों की स्थापना पर उस समय भारत में गैर जीवन बीमा कारोबार कर रही 106 कंपनियों का उनमें

विलय कर दिया गया।

16. मल्होत्रा समिति एवं आईआरडीए: उद्योग के विकास के लिए परिवर्तन की खोज एवं सिफारिश और साथ ही प्रतिस्पर्धा की पुनः शुरुआत हेतु वर्ष 1993 में मल्होत्रा समिति का गठन किया गया। समिति ने अपनी रिपोर्ट वर्ष 1994 में प्रस्तुत की।

17. वर्ष 1997 में बीमा विनियामक प्राधिकरण (आईआरए) की स्थापना की गई।

18. वर्ष 1999 में बीमा नियामक एवं विकास प्राधिकरण अधिनियम (आईआरडीए) के पारित किए जाने के बाद अप्रैल 2000 में जीवन एवं गैर-जीवन दोनों ही बीमा उद्योग की सांविधिक नियामक निकाय के रूप में भारतीय बीमा विनियामक एवं विकास प्राधिकरण (आईआरडीएआई) की स्थापना की गई।

19. 2014 में जारी किए गए अध्यादेश के तहत कुछ शर्तें जोड़ी गयी हैं जो भारत में बीमा कंपनियों की परिभाषा और गठन को नियंत्रित करने से संबंधित हैं।

20. वर्तमान जीवन बीमा उद्योग इसे समय वर्तमान में भारत में 24 जीवन बीमा कंपनियां परिचालनरत है जिसका विवरण नीचे दिया गया है:

21. भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) सार्वजनिक क्षेत्र की एक कंपनी है।

22. निजी क्षेत्र में 23 जीवन बीमा कंपनियां हैं।

23. भारत सरकार के अधीन डाक विभाग भी डाक जीवन बीमा के ज़रिए जीवन बीमा कारोबार कर रहा है, परंतु यह नियामक के अधिकार क्षेत्र से मुक्त है।

24. बीमा किस प्रकार कार्य करता है: सर्वप्रथम, परिसंपत्ति ऐसी होनी चाहिए जिसमें आर्थिक मूल्य विद्यमान हो।

a. वस्तुगत (फिजिकल) हो सकती है (जैसे गाड़ी अथवा भवन)

b. व्यक्तिपरक (नान-फिजिकल) हो सकती है (जैसे नाम या रण्याति (गुडविल) या

C व्यक्तिगत (पर्सनल) हो सकते हैं (जैसे किसी की आँख, हाथ-पैर एवं शरीर के अन्य अंग)

26. किसी निश्चित घटना घटित होने से संपत्ति का मूल्य नष्ट हो सकता है। हानि की इस संभावित स्थिति को जोखिम (रिस्क) कहते हैं। जोखिम भरी घटना के कारण को आपदा (पेरिल) कहते हैं।

27. एक सिद्धान्त जिसे पूलिंग धनराशि एक प्रकीयो के नाम से जाना जाता है। इसके तहत, विभिन्न व्यक्तियों से वैयक्तिक अंशदान (जिसे प्रीमियम कहते हैं) एकत्रित किया जाता है। इन व्यक्तियों के पास एक जैसी सम्पत्ति जिनमें एक जैसी जोखिम की संभावना होती है।

28. आपदा के कारण कुछ लोगों को हुई हानि की क्षतिपूर्ति हेतु इस सामूहिक निधि का प्रयोग किया जाता है।

29. निधि (फंड) एकत्रिते (पूलिंग) करना एवं कुछ दुर्भाग्यशाली लोगों की क्षतिपूर्ति करने की प्रक्रिया एक संस्था द्वारा की जाती है जिसे बीमाकर्ता कहते हैं।

30. बीमाकर्ता, प्रत्येक व्यक्ति जो इस योजना में भाग लेना चाहता है, के साथ बीमा अनुबंध करता है। ऐसे सहभागी को बीमित कहते हैं।

31. बीमा, बोझ हलका करता है: जोखिम के बोझ का आशय, किसी परिस्थिति/घटना के घटने के परिणामस्वरूप सहन की जाने वाली लागत, हानि एवं विकलांगताओं से है।

32. जोखिम बोझः व्यक्ति दो प्रकार के जोखिम के बोझ को ढ़ोता है- महत्वपुर्ण एवं कम महत्वपुर्ण (गौण)।

A. जोखिम का महत्वपूर्ण बोझः जोखिम के महत्वपुर्ण बोझ में ऐसी हानियों को शामिल किया जाता है, जिन्हें शुद्ध जोखिम घटनाओं के फलस्वरूप वास्तविक रूप में परिवार (एवं कारोबारी यूनिटों) द्वारा सहन किया जाता है।

B. जोखिम का कम महत्वपूर्ण बोझः मान लें कि कोई घटना नहीं घटी एवं किसी प्रकार की कोई हानि नहीं हुई। क्या इसका यह अर्थ हे कि जिनके समक्ष आपदा की संभावना है, उन्हें किसी प्रकार का बोझ नहीं है? इसका जवाब यह है कि महत्वपूर्ण बोझ के साथ-साथ व्यक्ति जोखिम के कम महत्वपूर्ण बोझ के भी वहन करता है।

33, जोखिम से बचावः हानि की स्थिति से हुए जोखिम को नियंत्रित करना ही जोखिम से बचाव करप जाता है। परंतु जोखिम से बचाव, जोखिम संभालने का नकारा‌भिक उपाय है। KU

34. जोखिम अपने पास रखना (रिस्क रिटेंशन): व्यक्ति जोखिम के प्रभाव को संभालने करने की की कोशिश करता है एवं स्वयं ही जोखिम तथा उसके प्रभाव को सहने का निर्णय लेता है। यह स्व-बीमा (स्त्फ इंश्योरंस) के रुप में जाना जाता है।

35. घटना के अवसर को कम करने के लिए उठाए गए उपायों को ‘हानि रोकधाम (लॉस प्रिवेशन)’ कहते हैं। हानि की मात्रा को कम करने के उपायों को ‘हानि कम करना (लॉस रिडक्शन)’ कहते हैं।

36. बीमा जोखिम को किसी और को दे देने का एक मुख्य स्वरूप है, और यह बीमा क्षतिपूर्ति के ज़रिए अनिश्चितता को निश्चितता में बदलने की अनुमति प्रदान करता है।

37. बीमा चयन से पूर्व ध्यान दी जाने वाली बातें:

a. थोड़े के लिए बहुत ज्यादा जोखिम न लें

b. हानि सह सकने की सामर्थ्य से ज्यादा जोखिम न लें

C. जोखिम के संभावित परिणामों के बारे में सावधानी पूर्वक सोचें

38. बीमा व्यवस्था में निम्नलिखित जैसे तत्व

a. सम्पति

b. जोखिम

C. आपदा

d. अनुबंध

e. बीमाकर्ता एवं

f. बीमित

39. जब एक जैसी सम्पति या परिसंपत्तियों के मालिक, जो एक जैसी जोखिम वहन करते हैं, निधि (फंड) के सामूहिक पूल में अपना-अपना अंश देते हैं तो उसे पूलिंग कहते हैं |

2. ग्राहक सेवा

1. उच्च गुणवत्तापूर्ण सेवा क्या है? इसकी विशेषताएं क्या हैं? सेवा की गुणवत्ता पर एक प्रसिद्ध मॉडल [“SERVQUAL नामक हमें कुछ अंतर्दृष्टि प्रदान करेगा। यह सेवा की गुणवत्ता के पांच प्रमुख संकेतकों पर प्रकाश डालता है।

a. विश्वसनीयता

b. जवाबदेही

८. आश्वासन

d. सहानुभूति

e. मूर्त वस्तुएं

2. ग्राहक का आजीवन मूल्यः इसके तीन भाग हैं।

3. ऐतिहासिक मूल्यः प्रीमियम औरुञ्जिन्य आय जो ग्राहक से अतीत में प्राप्त किए गए हैं |

b. वर्तमान मुल्यः भविष्यू के प्रिमियम जिसके मौजूदा व्यवसाय के बने रहने पर प्राप्त होने कि अपेक्षा की जाती है |

C संभावित मूल्यः प्रिमियम का मूल्य जो ग्राहक को अतिरिक्त उत्पाद खरीदने के लिए राजी करके प्राप्त किया जा सकता है |

4. सेवा का मतलब है किसी भी विवरण की सेवा जो संभावित उपयोगकर्ताओं को उपलब्ध कराई गयी है और जिसमें बैंकिंग, वित्त, बीमा, परिवहन, प्रोसेसिंग, बिजली या अन्य ऊर्जा की आपूर्ति, बोर्ड या अस्थायी आवास या दोनों, आवासीय निर्माण, मनोरंजन, मौज-मस्ती या समाचार अथवा अन्य जानकारी प्रदान करने के संबंध में सुविधाओं का प्रावधान शामिल है।

5. उपभोक्ता का मतलब है ऐसा कोई भी व्यक्ति जो :

a. एक प्रतिफल के लिए कोई सामान खरीदता है और इस तरह के सामान के किसी भी उपयोगकर्ता को शामिल करता है। लेकिन ऐसे किसी व्यक्ति को शामिल नहीं करता है जो इस तरह के सीमान को पुनर्विक्रय के लिए या किसी भी व्यावसायिक उद्देश्य के लिए प्राप्त करता है या

b. एक प्रतिफल के लिए कोई भी प्राप्त करता है या किराए पर लेता है और ऐसी सेवाओं के लाभार्थी को शामिल करता है।

6. दोष’ का मतलब निष्पादन की गुणवत्ता, प्रकृति और तरीके में कोई भी दोष, अपूर्णता, कमी, अपर्याप्तता है जो किसी भी क़ानून के तहत या उसके द्वारा बनाए रखी जाना आवश्यक है। या किसी अनुबंध के पालन में या अन्यथा किसी भी सेवा के संबंध में किसी व्यक्ति द्वारा निष्पादन का वचन दिया गया है।

7. ‘शिकायत’ का मतलब है एक शिकायतकर्ता द्वारा लिखित रूप में लगाया गया कोई भी आरोप ।

7. ‘शिकायत’ का मतलब है एक शिकायतकर्ता द्वारा लिखित रूप में लगाया गया कोई भी आरोप ।

8. ‘उपभोक्ता विवाद’ का मतलब है ऐसा विवाद जहां वह व्यक्ति जिसके विरुद्ध शिकायत की गयी है, शिकायत में निहित आरोपों से इनकार करता है और उनका विरोध करता है

9. उपभोक्ता विवादों की श्रेणियां: जहां तक बीमा व्यवसाय का सवाल है, तीनों फोरमों के अधिकांश उपभोक्ता विवाद निम्नलिखित मुख्य श्रेणियों में आते हैं:

a. दावों के निपटान में देरी

b. दावों का निपटारा नहीं करना

C. दावों का अस्वीकरण

d. हानि की मात्रा

e. पॉलिसी के नियम, शर्तें आदि

10. बीमा अधिनियम, 1938 3 की शक्तियों के तहत केंद्र सरकार ने 11 नवंबर, 1998 को आधिकारिक राजपत्र में प्रकाशित। एक अधिसूचना के द्वारा लोक शिकायत निवारण नियम, 1998 बनाया है।

11. लोकपाल, बीमाधारक और चीमा की आपसी सहमति से प्रसंग की शों के भीतर एक मध्यस्थ और परामर्शदाता के रूप में कार्य कर सकता है। शिकायत को अंतिम होता है। स्वीकारो अस्वीकार करने का लोकपाल का निर्णय

12. विश्वास के तत्वः

a. आकर्षण

b. मौजूदगी

C. संचार

13. संचार प्रक्रियाः संचार क्या है

सभी संचारों में प्रेषक, जो संदेश भेजता है और उस संदेश के प्राप्तकर्ता की आवश्यकता होती है। प्राप्तकर्ता को प्रेषक का संदेश समझ में आने के साथ ही यह प्रक्रिया पूरी हो जाती है।

14. संचार के रूपः संचार के कई रूप हो सकते हैं:

a. मौखिक

b. लिखित

C. गैर-मौखिक

d. शारीरिक भाषा का प्रयोग

15. स्रोतः संदेश के स्रोत के रूप में एजेंट वह क्यों संवाद करने जा रहा हा है उ और क्या उसे यह विश्वास होना चाहिए कि सटीक है। होना चाहिए कि संबोदे करना चाहता है, और Kumanी रही जानकारी उपयोगी और

16. संदेश वह जानकारी है। व्यक्ति बताना चाहता है।

17. एनकोडिंग जानकारी हस्तांतरित करने की प्रक्रिया है जिसे व्यक्ति एक ऐसे रूप में बतिनो चाहता। है जो आसानी से भेजा जा सके और दूसरी ओर सही तरीके से समझा (डीकोड किया) जा सके।

18. कोई भी संदेश एक चैनल के माध्यम से भेजा जाता है जिसे इस प्रयोजन के लिए चुना जाना आवश्यक है। चैनल व्यक्तिगत आमने सामने की बैठकों, टेलीफोन और वीडियो कांफ्रेंसिंग सहित मौखिक हो सकता है; या इसे पत्र, ईमेल, मेमो और रिपोर्ट सहित लिख कर भेजा जा सकता है।

19. डीकोडिंग वह चरण है जिसमें गंतव्य पर जानकारी प्राप्त होती है, उसकी व्याख्या की जाती है और इसे निश्चित तरीके से समझा जाता है |

20. प्राप्तकर्ताः अंत में प्राप्तकर्ता होता है, वह/वे व्यक्ति [दर्शक/श्रोता] जिनको संदेश भेजा भेजा जाता है। इस दर्शक श्रोता के प्रत्येक सदस्य के पास अपने विचार, मान्यताएं और भावनाएं होती हैं और ये इस बात को प्रभावित करेंगे कि संदेश कैसे प्राप्त किया गया है और उस पर कैसी कार्रवाई हुई है।

21. जैसे ही संदेश भेजा और प्राप्त किया जाता है, प्राप्तकर्ता द्वारा प्रेषक को मौखिक और गैर-मौखिक संदेश के रूप में प्रतिक्रिया भेजने की संभावना रहती है।

22. जवाबदेही और कॉपरिट प्रशासन के बारे में चर्चा बढ़ती जा रही है, इन सभी को एक साथ व्यवसाय में “नैतिकता कहा जा सकता है।

23. सूचना का अधिकार अधिनियम जैसे क्रैोनून और जनहित याचिका जैसी प्रगति को बेहतर जवाबदेही और सुशासन प्राप्त करने के साधन के रूप में काफी महत्वपूर्ण माना गया है।

24. नैतिक आचरण अपने आप सुशासन की ओर ले जाता है। जब व्यक्ति अपना काम कर्तव्यपरायणता और ईमानदारी से पूरा करता है तो यह सुशासन है। Shy

25. सक्रिय रूप से सुनने में ध्यान देना, प्रतिक्रिया प्रदान करना और उचित तरीके से जवाब देना शामिल है।

26. नैतिक आचरण में ग्राहक के हित को अपने हित से आगे रखना शामिल है।

3. शिकायत निवारण प्रणा

1. आईआरडीएआई के विनियमों में बीमा कंपनी द्वारा उपभोक्ता को प्रदान की जाने वाली विभिन्न सेवाओं के लिए टर्नअराउंड टाइम (टीएटी) निर्धारित किया गया है। ये आईआरडीएआई (पॉलिसीधारकों का हित संरक्षण विनियम), 2002 का हिस्सा हैं।

2. आईआरडीए ने एकीकृत शिकायत प्रबंधन प्रणाली (आईजीएमएस) की शुरूआत की है जो बीमा शिकायत डेटा के केंद्रीय भंडार के रूप में और उद्योग में शिकायत निवारण की निगरानी के उपकरण के रूप में कार्य करता है।

3. उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986: यह अधिनियम “उपभोक्ताओं के हितों का बेहतर संरक्षण प्रदान करने के लिए और उपभोक्ता विवादों के निपटान के लिए उपभोक्ता परिषदों और अन्य प्राधिकरणों की स्थापना का प्रावधान करने के उद्देश्य से पारित किया गया था।” इस अधिनियम को उपभोक्ता संरक्षण उपभोक्ता संस्क्षण (संशोधन) अधिनियम, 2002 के द्वारा संशोधित किया गया है |

4. जुड़ीकल

राष्ट्रीय आयोगः ध्यान देता है: केंद्र सरकार की अधिसूचना द्वारा स्थापित इन बातों पर है

a. ऐसी शिकायतें जहां सामान/सेवाओं का मूल्य और क्षतिपूर्ति का दावा, यदि किया गया है, 1 करोड़ रुपए से अधिक होता है; और

b. और किसी राज्य आयोग के आदेशों के खिलाफ की गई अपील की सुनवाई करता है

5. राज्य आयोगः राज्य सरकार द्वारा राज्य में स्थापित इन बातों पर ध्यान देता है |

a. ऐसी शिकायतें जहां सामान/सेवाओं का मूल्य और क्षतिपूर्ति का दावा, यदि किया गया है, 20 लाख रुपए से अधिक लेकिन 1 करोड़ रुपए से अधिक नहीं होता है; और

b. राज्य में किसी भी जिला फोरम के खिलाफ की गई अपील की सुनवाई करता है।

6. जिला फोरमः राज्य सरकार द्वारा प्रत्येक जिले में स्थापित इन बातों पर ध्यान देता है।

a. ऐसी शिकायतें जहां सामान/सेवाओं का मूल्य क्षतिपूर्ति का दावा, यदि किया गया हो, 20 लाख रुपए से अधिक नहीं है।

7. आईआरडीए ने एक एकीकृत शिकाय प्रबंधन प्रणाली (आईजीएमएस) की शुरूआत की है जो बीमा शिकायत डेटा के केंद्रीय भंडार के रूप में और उद्योग में शिकायत निवारण की निगरानी के लिए उपकरण के रूप में कार्य करती है

8. उपभोक्ता विवाद निवृद्धिरण एजेंसियां प्रत्येक जिले तथा राज्य में और राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित की गयी हैं।

9. जहां तक बीमा कारोबार का सवाल है, अधिकांश उपभोक्ता विवाद दावों के निपटान में देरी, दावों का निपटान नहीं होने, दावों की अस्वीकृति, नुकसान की मात्रा और पॉलिसी के नियमों, शर्तों आदि जैसी श्रेणियों में आते हैं।

10. बीमा लोकपाल, बीमाधारक और बीमा कंपनी की आपसी सहमति से संदर्भ की शर्तों के भीतर एक मध्यस्थ और परामर्शदाता के रूप में कार्य कर सकते हैं।

11. अगर विवाद का निपटारा मध्यस्थता द्वारा नहीं होता है तो लोकपाल बीमाधारक को ऐसा फैसला पारित करेगा जो उसकी नज़र में उचित है |

और बीमाधारक के नुकसान को कवर करने के लिए आवश्यक राशि से अधिक नहीं होगा।

4. बीमा विनियामक अभिकर्ताओं की पहलू

1. “अधिनियम” से समय-समय पर यथासंशोधित बीमा अधिनियम, 1938 (1938 का 4) अभिप्रेत है;

2. “नियुक्ति पत्र” से बीमा अभिकर्ता के किसी व्यक्ति को अभिप्रेत है। कार्य करने के लिए बीमाकर्ता द्वारा जारी किया ग गया नियुक्ति का पत्र अभिप्रेत है।

3. “अपील अधिकारी” से बीमो अभिकर्ता से प्राप्त अभ्यावेदनों और अपीलों पर विचार करने एवं उनका निपटान करने के लिए बीमाकर्ता द्वारा प्राधिकृत अधिकारी अभिप्रेत है।

4. “बीमा अभिकर्ता” से वह व्यक्ति अभिप्रेत है जो बीमाकर्ता द्वारा बीमा पॉलिसियों की निरंतरता, नवीकरण अथवा पुनः प्रवर्तन से संबंधित व्यवसाय सहित बीमा व्यवसाय की अपेक्षा अथवा प्रापण करने के प्रयोजन के लिए नियुक्त किया गया हो।

5. “प्राधिकरण” से बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999 (1999 का 41) की धारा 3 के अधीन स्थापित भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अभिप्रेत है।

6. “विविध बीमा अभिकर्ता ” से वह व्यक्ति अभिप्रेत है जिसकी नियुक्ति दो या उससे अधिक बीमाकर्ताओं द्वारा बीमा अभिकर्ता के रूप

में इस शर्त के अधीन की गई हो कि वह एक जीवन बीमाकर्ता, एक साधारण बीमाकर्ता, एक स्वास्थ्य बीमाकर्ता और एकल श्रेणी (मोनो- लाइन) बीमाकर्ताओं में से प्रत्येक श्रेणी में एक बीमाकर्ता से अधिक के लिए बीमा अभिकर्ता के रूप में कार्य नहीं करेगा/करेगी।

7. “अभिकर्ताओं की केंद्रीकृत सूची” से प्राधिकरण द्वारा अनुरक्षित अभिकर्ताओं की वह सूची अभिप्रेत है, जिसमें सभी बीमाकर्ताओं द्वारा नियुक्त अभिकर्ताओं का समस्त विवरण निहित हो।

8. “काली सूची में दर्ज अभिकर्ताओं की केंद्रीकृत सूची” से प्राधिकरण द्वारा अनुरक्षित उन अभिकर्ताओं की सूची अभिप्रेत है जिनकी नियुक्ति बीमाकर्ता के नामित अधिकारी द्वारा आचरण संहिता के उल्लंघन और/या धोखाधड़ी के कारण निरस्त / निलंबित किया गया हो।

9. “नामित अधिकारी” से बीमाकर्ता द्वारा बीमा अभिकर्ता के रूप में किसी व्यक्ति की नियुक्ति करने के लिए प्राधिकृत अधिकारी अभिप्रेत है।

10. “परीक्षा निकाय” से वह संस्था अभिप्रेत है जो बीमा अभिकर्ताओं के लिए भर्ती-पूर्व परीक्षाओं को संचालन करती है तथा जो प्राधिकरण द्वारा विधिवत मान्यता प्राप्त है।

11. “एकल श्रेणी बीमाकर्ता” से इन विनियमों के प्रयोजन के लिए वह बीमाकर्ता अभिप्रेत है जो बीमा अधिनियम, 1938 की धारा 2(9) के अंतर्गत परिभाषित रूप में बीमाकर्ता हो तथा कृषि बीमा, निर्यात ऋण गारंटी व्यवसाय जैसे व्यवसाय की एक विशिष्ट विशेषीकृत श्रेणी का व्यवसाय करता हो।

12. “बहुस्तरीय विपणन योजना” से अधिनियम की धारा 42ए के स्पष्टीकरण में परिभाषित रूप में कोई योजना अभिप्रेत है।

13. बीमाकर्ता नियुक्ति से त्याग पत्र अथवा नियुक्ति के अभ्यर्पण की तारीख से 15 दिन की अवधि में फार्म -सी में दिये गये विवरण के अनुसार समापन प्रमाणपत्र जारी करेगा।

5. जीवन बीमा के कानूनी सिद्धांत

अनुबंध, कानून द्वारा लागू करने योग्य दो पक्षों के बीच किया जाने वाला एक समझौता है। भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1882 के प्रावधान भारत में बीमा अनुबंध सहित सभी संविदाओं को नियंत्रित करते हैं।

1. बीमा पॉलिसी दो पक्षों यानि कि बीमाकर्ता कहे जानेवाली कंपनी और बीमित कहे जाने वाले पॉलिसीधारके के बीच अनुबंध है और यह भारतीय अनुबंध अधिनियम, 187 में उल्लिखित आवश्यकताओं को पूरा करती है |

2. बीमा अधिनियम में हाल में किये गए संशोधनों (मार्च, 1938 2015) में उन स्थितियों के बारे में कुछ दिशानिर्देश प्रदान किये गए हैं जिनके अंतर्गत किसी पॉलिसी पर धोखाधड़ी के लिए सवाल उठाया जा सकता है।

3. वैध कानूनी अनुबंध के तत्वः

a. प्रस्ताव और स्वीकृति

b. प्रतिफल

C. पक्षों के बीच समझौता

d. स्वतंत्र सहमति

e. पक्षों की क्षमता

f. वैधता

4. दबाव इसमें आपराधिक साधनों के माध्यम से डाला जाने वाला दबाव शामिल है।

5. अनुचित प्रभाव जब कोई व्यक्ति किसी दूसरे के इच्छा पर हावी होने में सक्षम होगा तो वह दूसरे से अनुचित लाभ उठाने के लिए उस स्थिति का उपयोग करेगा।

6. धोखाधड़ी जब कोई व्यक्ति गलत विश्वास पर दूसरे को काम करने के लिए प्रेरित करता है जो ऐसी प्रस्तुति के कारण होता है जिसे सत्य नहीं मानना चाहिए। यह तथ्यों के जानबूझकर छिपाव से या उनको गलत तरीके से प्रस्तुत करने के कारण हो सकता है।

7. गलती – किसी के ज्ञान या विश्वास में या किसी वस्तु या घटना की व्याख्या करने में होने वाली तुति, इससे अनुबंध की विषय-वस्तु के बारे में किये जा रहे समझौते को ससुझने में गलती हो सकती है।

8. परम सद्भाव या अदमोस्ट गुड फेथः यह बीमा अनुबंध का एक मौलिक सिद्धांत है सिंह चेरम विश्वास भी कहलाता है, जिसका मतलब होता है कि अनुबंध करने वाले प्रत्येक पक्ष बीमा की विषय-वस्तु से संबंधित सभी महत्वपुर्ण तथ्यों का खुलासा करें। सद्भाव व परम सद्भाव में अंतर किया जा सकता है।

9. सद्भाव के पालन करने के लिए कानूनी कर्तव्य के अलावा यह है कि विक्रेता क्रेता को अनुबंध की विषय-वस्तु के बारे में कोई जानकारी देने के लिए बाध्य नहीं है।

10. यहाँ ध्यान देने वाला नियम “देखकर बेचें” हैं जिसका मतलब है, क्रेता सावधान।

11. परम सद्भावः बीमा अनुबंध अलग-अलग आधार पर होते हैं। सबसे पहले, अनुबंध की विषय-वस्तु अमूर्त है और बीमाकर्ता के प्रत्यक्ष अवलोकन या अनुभव द्वारा आसानी से जानी नहीं जा सकती है। इसके साथ ही कई अन्य तथ्य हैं जो अपनी प्रवृति के कारण स्वभावतः केवल प्रस्तावक द्वारा ही जाने जा सकते हैं। बीमाकर्ता को जानकारी के लिए बताई गई बातों पर अक्सर पूरी तरह भरोसा करना होता है।

12. “परम विशवस” की अवधारणा को, “प्रस्तावित किये जा रहे जोखिम के लिए माँगे जाने पर या बिन माँगे सभी तथ्यों को सही तरह से और पूर्ण रूप से स्वेच्छा से बताने के सकारात्मक कर्तव्य” को शामिल करने के रूप में परिभाषित किया गया है।

13. यदि दोनों में में से किसी भी एक पक्ष ने परम सद्भाव का पालन नहीं किया तो दूसरा पक्ष उस संविदा को टाल सकता है ।

14. परम सद्भाव का उल्लंघनः अब हम उन परिस्थितियों पर विचार करेंगे जो परम सद्भाव के उल्लंघन में शामिल हो सकती हैं। इस प्रकार का उल्लंघन या तो गैर-प्रकटीकरण या गलतबयानी से पैदा हो सकता है।

a. गैर-प्रकटीकरण यह तब हो सकता है जब बीमित आमतौर पर महत्वपूर्ण तथ्यों के बारे में चुप रहता है क्योंकि बीमाकर्ता ने कोई विशेष जाँच नहीं की है। यह बीमाकर्ता द्वारा पूछे गए प्रश्नों के गोलमोल उत्तर से भी हो सकता है।

b. गलतबयानीः बीमा अनुबंध के लिये प्रक्रिया के दौरान दिया गया कोई भी बयान अभ्यावेदन कहलाता है। अभ्यावेदन तथ्य का सही कथन या विश्वास, इरादे या अपेक्षा का बयान हो सकता है। तथ्य के बारे में यह अपेक्षा की जाती है कि बयान काफी हद तक सही होना चाहिए |

15. 2014 के अध्यादेश में उन स्थितियों के बारे में कुछ दिशानिर्देश दिए गए हैं जिनके तहत किसी पॉलिसी पर धोखाधड़ी का सवाल उठाया जा सकता है।

16. नजदीकी कारणः अंतिम कानूनी सिद्धांत नजदीकी कारण का सिद्धांत है। नजदीकी कारण बीमा का एक प्रमुख सिद्धांत है और इसका मतलब यह जानना होता है कि वास्तव में हानि या क्षति कैसे धारित हुई तथा यह कि क्या यह किसी बीमित आपदा की परिणति है।

17. नजदीकी कारण को इस प्रकार परिभाषित किया गया है वह सक्रिय एवं प्रभावोत्पादक कारण जो घटनाओं की श्रृंखलाओं को शुरु करता है और जिसके परिणामस्वरुप कोई घटना घटित होती है और जिसमें नये एवं स्वतंत्र स्त्रोत से शुरु होने वाले किसी बल का कोई हस्तक्षेप नहीं रहता।

18. अनुसरण का अनुबंधः पक्ष को अनुरसण करने का अवसर देते वे अनुबंध होती हैं जो अन्य हुए उस पक्ष क्ष द्वारा ड्राफ्ट की गई होती हैं जिनके पास बड़ा सौदेबाजी लाभ है, जैसे कि अनुबंध को स्वीकार या अस्वीकार करना ।

19. पॉलिसी लेने के बा बाद पॉलिसीधारक को फ्री-लुक अवधि दी गई है, जिसे पॉलिसी बाँड मिलने के 15 दिनों के भीतर, असहमति होने पर इसे रद्द कर सकने का विकल्प दिया जाता है।

आपके उज्ज्वल भविष्य की कामना करता हूँ।

 

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